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Friday, 15 May 2020

सुरकंडा देवी का मंदिर।

उत्तराखंड के टिहरी जनपद में स्थित जौनुपर के सुरकुट पर्वत पर स्थित सुरकंडा देवी का मंदिर। यह स्‍थान समुद्रतल से करीब तीन हजार मीटर ऊंचाई पर है। आगे जानिए, इस मंदिर की स्‍थापना की रोचक कहानी।


Surkanda Devi
Surkanda Devi

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जब हिमालय के राजा दक्ष ने कनखल में यज्ञ का आयोजन किया, तो अपने दामाद भगवान शिव को निमंत्रण नहीं भेजा। ऐसे में दक्ष की बेटी और भगवान शिव की पत्नी देवी सती नाराज हो गई।

अपने पति के अपमान के आहत माता सती ने राजा दक्ष के यज्ञ में आहूति दे दी। इससे भगवान शिव उग्र हो गए। उन्होंने माता सती का शव त्रिशूल में टांगकर आकाश भ्रमण किया। इस दौरान नौ स्‍थानों पर देवी सती के अंग धरती पर पड़े। वे स्‍थान शक्तिपीठ कहलाए।

Surkanda Devi
Surkanda Devi

इसी में देवी सती का सिर जहां गिरा। वह स्‍थान माता सुरकंडा देवी कहलाया। पौराणिक मान्यता है कि देवताओं को हराकर राक्षसों ने स्वर्ग पर कब्जा कर लिया था। ऐसे में देवताओं ने माता सुरकंडा देवी के मंदिर में जाकर प्रार्थना की कि उन्हें उनका राज्य मिल जाए। उनकी मनोकामना पूरी हुई और देवताओं ने राक्षसों को युद्घ में हराकर स्वर्ग पर अपना आधिपत्य स्‍थापित किया।

Surkanda Devi
Surkanda Devi


Surkanda Devi
Surkanda Devi


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Wednesday, 13 May 2020

राजा हरुहीत (Raja Haruhit)


हिमालय का सौन्दर्य जितना आकर्षक है उतनी ही सुन्दर कहानियाँ यहाँ की लोक कथाओं और गीतों में दिखाई देती है। उत्तराखंड के विभिन हिस्सों की कहानियाँ हमेशा लोकगाथाओं के रूप में जन जन तक पहुँची हैं। ऐसी ही एक लोककथा राजा हरुहीत की है।


राजा हरुहीत की कहानी लगभग 200 वर्ष पुरानी है। उत्तराखंड के लोग उन्हें भगवान के रूप में पूजते हैं। आज भी लोग उनके मंदिर में दुआ मांगते हैं। उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में जगह जगह इनके मंदिर दिखाई देते हैं। राजा हरुहीत कूमाऊँ की संस्कृति और आस्था के प्रतीक हैं। न्याय के लिए गुहार करने वाले लोगों का विश्वास है कि राजा हरुहीत सही न्याय करते हैं और लोग राजा जी के दर्शन के लिये दूर-दूर से आते हैं।
हरुहीत सम्राट समर सिंह के आठवे संतान थे। राजा समर और उनके सात पुत्रों के मृत्यु के समय हरुहीत अपनी माँ की कोख में थे। राजा समर के मृत्यु उपरान्त राजा को मिलने वाली रकम बंद हो गई थी और राजकोष भी पूरी तरह खाली हो चुका था। उस समय हरूहीत की माँ और सात भाभियाँ बड़े ही दुखदायी दिन काट रहे थे। एक दिन खेल-खेल में राजा हरूहीत को अपने बीते हुये समय के बारे में पता चला तो वह माँ के आगे जिद कर के बैठ जाते हैं कि उन्हें उनके बीते समय का इतिहास बतायें। माँ ने राजा हरूहीत को उनके सातो भाईयों के और अपने राजकाज के बारे में विस्तारपूर्वक बताया। जिसके बाद हरूहीत ने सभी लोगों को आदेश दिया कि वो उनके वचनों का पालन करे और चौदह साल की रकम एक साथ वसूल कर जमा कर जायें। हरूहीत की पुकार सुन पूरे इलाके में खलबली मच गई और एक दिन में ही सब कुछ चौदह वर्ष पहले की भांति कामकाज चलने लगा। वीर बालक हरूहीत के कार्यप्रणाली से दुश्मनों ने उनकी भाभियों को भड़का दिया और वह घर छोड़कर दो भाई भैसियों के घर चले गई। बाद में हरूहीत उन्हें ढूँढ़ते वहां पहुँच जाते हैं और रानीखेत युद्ध में एक बार हारकर मृत्यु शरीर में फिर से जीवन लौटने के बाद दोनों भाईयों को बुरी मौत देते हैं।

बाद में सातों भाभियों की शर्त पर हरुहीत भोट देश के यात्रा पर जाते हैं। इस देश के लोग जादू टोने से मनुष्य को जो चाहे बना सकते थे और उस जमाने में जो भी भोट देश के यात्रा पर जाता था वह वापस नहीं लौटता था।

भोट यात्रा के दौरान उन्हें जगह-जगह पर स्थानीय राजाओं या समस्याओं से लड़ना पड़ा। हरूहीत लुतलेख के रास्ते भोट के साथ ही बागनाथ के मन्दिर में पूजा-अर्चना करते हैं। गंगला संग सात बहनों के भोट के जादुई मन्त्रों के शिकार हुये हरूहीत को मालू पुन: जीवित करती है। मालू अपने पिता और हरूहीत में एक का चयन चंद पलों में कर हरूहीत का आजीवन साथ देने की कसम लेती है। आगे भोट पर विजय प्राप्त कर मालू से विवाह के साथ भोट से राजा हरूहीत सल्ट को वापस आ जाते हैं। सल्ट लौटकर सातों भाभियों ने कुछ दिन के अन्तराल में ही रानी मालू शाही को रामगंगा के गहरे पानी में डूबो दिया। मालू शाही की मौत से राजा पूरी तरह जीवन के सार से खिन्न हो जाते हैं और सातो भाभियों को दण्ड देते हुए हिन्दू रिवाज के साथ अग्नि को समर्पित कर देते हैं। आगे माँ से आग्रह करते है कि वह अपने सांस को रोक कर प्रभू के चरणों में अपने प्राण रख दे। माँ के मृत्यु के साथ माँ की अन्तेष्टि करने के बाद राजा हरूहीत दो चिता लगाकर मालू संग खुद और अपने हमदर्द घोड़े को भी अग्नि को समर्पित कर देते हैं।




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English Translation:


Raja Haruhit

The beauty of the Himalayas is as attractive as the beautiful stories that appear in folk tales and songs here. The stories of various parts of Uttarakhand have always reached the masses in the form of folklore. One such folklore is that of King Haruhit.

The story of Raja Haruhit is about 200 years old. The people of Uttarakhand worship him as God. Even today people pray for him in his temple. Their temples are seen everywhere in the hill areas of Uttarakhand. Raja Haruhit is a symbol of the culture and faith of Kumaon. People pleading for justice believe that King Haruhit does right justice and people come from far and wide to see Rajaji.
Haruhit was the eighth child of Emperor Samar Singh. At the time of King Samar and his seven sons, Haruhit was in the womb of his mother. After the death of King Samar, the amount received by the king was closed and the treasury was also completely empty. At that time Haruhit's mother and seven sisters-in-law were spending a very sad day. One day while playing sports, when King Haruhit came to know about his past, he insisted in front of his mother to tell him the history of his past. Mother told King Haruhit about his seven brothers and his kingdom in detail. After which Haruhit ordered all the people to follow his words and collect the amount of fourteen years at once. Hearing Haruhit's call, the whole area was disturbed and in a day everything started functioning like fourteen years ago. Due to the functioning of the brave child Haruhit, the enemies provoked her sisters and she left the house and went to the house of two brothers-in-law. Later Haruhit reaches there to find them and Ranikhet gives the two brothers a bad death after losing their life once again in the battle and returning to life again.

Later on the condition of seven sisters-in-law, Haruhit Bhot goes on a trip to the country. People of this country could make man whatever they wanted by witchcraft, and in that era, any Bhota who went on a trip to the country did not return.

During the Bhot Yatra, he had to fight local kings or problems from place to place. Haruhit worships in the temple of Bagnath along with Bhot through the path of Lutlekh. Malu resurrects Haruhit, who is the victim of magical spells of seven sisters with Ganga. Malu vows to support Haruhit for a lifetime by choosing one of his father and Haruhit in a few moments. After conquering Bhot, King Haruhit returns to Salt with his marriage to Malu. Returning to the Salt, the seven Bhabhis submerged Rani Malu Shahi in the deep waters of the Ramganga within a few days. With the death of Malu Shahi, the king is completely disenchanted with the essence of life and, while punishing the seven sisters, dedicates it to Agni with Hindu custom. Further, urging the mother to stop her breath and lay her life at the feet of Lord. After the mother's death, Raja Haruhit dedicates himself and his fellow horse with fire to Malu by placing two pyre.




Monday, 11 May 2020

गढ़वाल की लक्ष्मीबाई तीलू रौतेली


एक ऐसी वीरांगना जो केवल 15 वर्ष की उम्र में रणभूमि में कूद पड़ी थी और सात साल तक जिसने अपने दुश्मन राजाओं को कड़ी चुनौती दी थी। 15 से 20 वर्ष की आयु में सात युद्ध लड़ने वाली तीलू रौतेली संभवत विश्व की एक मात्र वीरांगना है। तीलू रौतेली उर्फ तिलोत्‍तमा देवी भारत की भारत की रानी लक्ष्‍मीबाई, चांद बीबी, झलकारी बाई, बेगम हजरत महल के समान ही देश विदेश में ख्‍याति प्राप्‍त हैं।

इसी बात को ध्‍यान में रखते हुए उत्‍तराखंड सरकार ने तीलू देवी के नाम पर एक योजना शुरू की है, जिसका नाम तीलू रौतेली पेंशन योजना है। यह योजना उन महिलाओं को समर्पित है, जो कृषि कार्य करते हुए विकलांग हो चुकी हैं। इस योजना का लाभ उत्‍तराखंड राज्‍य की बहुत सी महिलायें उठा रहीं हैं।

तीलू रौतेली के पिता का नाम गोरला रावत भूपसिंह था, जो गढ़वाल नरेश राज्य के प्रमुख सभासदों में से थे। गोरला रावत गढ़वाल के परमार राजपुतों की एक शाखा है जो संवत्ती 817( सन् 741) मे गुजर देश (वर्तमान गुजरात राज्य) से गढ़वाल के पौडी जिले के चांदकोट क्षेत्र के गुरार गांव(वर्तमान गुराड गांव) मे गढ़वाल के परमार शासकों की शरण मे आयी।इसी गांव के नाम से ये कालांतर मे यह परमारो की शाखा गुरला अथवा गोरला नाम से प्रवंचित हुई। रावत केवल इनकी उपाधी है। इन परमारो को गढ राज्य की पूर्वी व दक्षिण सीमा के किलो की जिम्मेदारी दी गयी।चांदकोट गढ ,गुजडूगढी आदि की किले इनके अधीनस्थ थे। तीलू के दोनो भाईयो को कत्युरी सेना के सरदार को हराकर सिर काटकर गढ़ नरेश को प्रस्तुत करने पर 42-42 गांव की जागीर दी गयी । युद्ध मे इन दोनो भाईयों(भगतु एवं पत्वा ) के 42-42 घाव आये थे। पत्वा(फतह सिंह ) ने अपना मुख्यालय गांव परसोली/पडसोली(पट्टी गुजडू ) मे स्थापित किया जहां वर्तमान मे उसके वंशज रह रहे है। भगतु(भगत सिंह )के वंशज गांव सिसई(पट्टी खाटली )मे वर्तमान मे रह रहे है।

कुछ ही दिनों में कांडा गाँव में कौथीग (मेला) लगा और बालिका तीलू इन सभी घटनाओं से अंजान कौथीग में जाने की जिद करने लगी तो माँ ने रोते हुये ताना मारा....
तीलू तू कैसी है, रे! तुझे अपने भाइयों की याद नहीं आती। तेरे पिता का प्रतिशोध कौन लेगा रे! जा रणभूमि में जा और अपने भाइयों की मौत का बदला ले। ले सकती है क्या? फिर खेलना कौथीग!
तीलू के बाल्य मन को ये बातें चुभ गई और उसने कौथीग जाने का ध्यान तो छोड़ ही दिया बल्कि प्रतिशोध की धुन पकड़ ली। उसने अपनी सहेलियों के साथ मिलकर एक सेना बनानी आरंभ कर दी और पुरानी बिखरी हुई सेना को एकत्र करना भी शुरू कर दिया। प्रतिशोध की ज्वाला ने तीलू को घायल सिंहनी बना दिया था, शास्त्रों से लैस सैनिकों तथा "बिंदुली" नाम की घोड़ी और अपनी दो प्रमुख सहेलियों बेल्लु और देवली को साथ लेकर युद्धभूमि के लिए प्रस्थान किया।

सबसे पहले तीलू रौतेली ने खैरागढ़ (वर्तमान कालागढ़ के समीप) को कन्त्यूरों से मुक्त करवाया, उसके बाद उमटागढ़ी पर धावा बोला, फिर वह अपने सैन्य दल के साथ "सल्ड महादेव" पंहुची और उसे भी शत्रु सेना के चंगुल से मुक्त कराया। चौखुटिया तक गढ़ राज्य की सीमा निर्धारित कर देने के बाद तीलू अपने सैन्य दल के साथ देघाट वापस आयी. कालिंका खाल में तीलू का शत्रु से घमासान संग्राम हुआ, सराईखेत में कन्त्यूरों को परास्त करके तीलू ने अपने पिता के बलिदान का बदला लिया; इसी जगह पर तीलू की घोड़ी "बिंदुली" भी शत्रु दल के वारों से घायल होकर तीलू का साथ छोड़ गई।

शत्रु को पराजय का स्वाद चखाने के बाद जब तीलू रौतेली लौट रही थी तो जल श्रोत को देखकर उसका मन कुछ विश्राम करने को हुआ, कांडा गाँव के ठीक नीचे पूर्वी नयार नदी में पानी पीते समय उसने अपनी तलवार नीचे रख दी और जैसे ही वह पानी पीने के लिए झुकी, उधर ही छुपे हुये पराजय से अपमानित रामू रजवार नामक एक कन्त्यूरी सैनिक ने तीलू की तलवार उठाकर उस पर हमला कर दिया।

निहत्थी तीलू पर पीछे से छुपकर किया गया यह वार प्राणान्तक साबित हुआ।कहा जाता है कि तीलू ने मरने से पहले अपनी कटार के वार से उस शत्रु सैनिक को यमलोक भेज दिया।

उनकी याद में आज भी कांडा ग्राम व बीरोंखाल क्षेत्र के निवासी हर वर्ष कौथीग (मेला) आयोजित करते हैं और ढ़ोल-दमाऊ तथा निशाण के साथ तीलू रौतेली की प्रतिमा का पूजन किया जाता है।

तीलू रौतेली की स्मृति में गढ़वाल मंडल के कई गाँव में थड्या गीत गाये जाते हैं।

ओ कांडा का कौथिग उर्यो
ओ तिलू कौथिग बोला
धकीं धे धे तिलू रौतेली धकीं धे धे
द्वी वीर मेरा रणशूर ह्वेन
भगतु पत्ता को बदला लेक कौथीग खेलला
धकीं धे धे तिलू रौतेली धकीं धे धेधे..





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English Translation : 

Laxmibai Teelu Rauteli of Garhwal

A heroine who jumped into the battlefield at the age of just 15 and for seven years, who challenged her enemy kings. Teelu Rauteli, who fought seven wars at the age of 15 to 20 years, is probably the only heroine in the world. Teelu Rauteli aka Tilottama Devi, the Queen of India, Laxmibai, Chand Bibi, Jhalkari Bai, Begum Hazrat Mahal, are famous in the country and abroad.

Keeping this in mind, the Government of Uttarakhand has started a scheme in the name of Teelu Devi, named Teelu Rauteli Pension Scheme. The scheme is dedicated to women who have become disabled while doing agriculture. Many women of Uttarakhand state are taking advantage of this scheme.

Teelu Rauteli's father's name was Gorla Rawat Bhup Singh, who was one of the prominent councilors of the state of Garhwal. Gorla Rawat is a branch of the Parmar Rajputs of Garhwal who came to the shelter of the Parmar rulers of Garhwal in Gujar village (present-day Gurad village) of Chandkot area of ​​Pauri district of Garhwal in Samvati 817 (AD 741). In the name of this village, this branch of Parmo was later spread under the name of Gurla or Gorla. Rawat is only his title. These Paramaras were given the responsibility of the kilo of the eastern and southern borders of the Garh state. Forts of Chandkot, Gadh, Gujadugadi etc. were under their control. Both brothers of Tillu were defeated by the head of the Katyuri army and beheaded and presented to the King of Fort 42-42. In the war, 42-42 wounds of both these brothers (Bhagatu and Patwa) were inflicted. Patwa (Fatah Singh) established his headquarters in the village Parsoli / Padsoli (Patti Gujadu) where his descendants are currently residing. The descendants of Bhagatu (Bhagat Singh) are currently living in the village Sisai (Patti Khatli).

In a few days, there was a Kothig (fair) in Kanda village, and the girl Tilu insisted to go to Kothig from all these incidents, then the mother taunted crying ....
How are you, dear! You don't miss your brothers Who will take revenge of your father! Ja go to the battlefield and avenge the death of his brothers. Can you take it? Play again kothig!
Tillu's childish mind got these things and he did not stop to go to Kauthig but caught the vengeance. He, along with his friends, started forming an army and started collecting the old scattered army. A flame of vengeance made Teelu an injured lioness, accompanied by the soldiers armed with scriptures and a mare named "Bindali" and departed for the battleground with her two leading friends Bello and Deoli.

First of all, Tilu Rauteli liberated Khairagarh (near present-day Kalagarh) from Kantur, then attacked Umtagarhi, then he reached "Sald Mahadev" with his army and also freed him from the clutches of the enemy army. After setting the border of the stronghold state till Chaukhutia, Tilu returned to Deghat with his army. In Kalinka Khal, there was a fierce battle with the enemy of Tillu, by defeating the Kantyurs in Saraikhet, Tilu avenged his father's sacrifice; At this place, Tilu's mare "Bindali" was also injured by the enemy's warts and left with Tilu.

When Teelu was returning to Rauteli after tasting the defeat of the enemy, he felt rested on seeing the water source, while drinking water in the eastern Nayar river just below Kanda village, he put his sword down and as soon as that water Bowing down to drink, there, humiliated by the hidden defeats, a Kanturi soldier named Ramu Rajwar picked up the sword of Tilu and attacked him.

This hide-and-seek attack on the unarmed Teelu proved fatal. It is said that Teelu sent the enemy soldier to Yamlok before killing his skewer before dying.

In his memory, even today the residents of Kanda village and Birkhal region organize Kauthig (fair) every year and the idol of Tilu Rauteli is worshiped along with Dhol-Damau and Nishan.

Thadya songs are sung in many villages of Garhwal Mandal in memory of Tilu Rauteli.

O Kanda's Kauthig Urio
O Tilu Kauthig said
Dhe dhe dhe dhe tilu roteli dhe dhe dhe dhe
Dwi Veer Mera Ranshur Huawei
Lake Kautig Khella replaced Bhagatu Leaf



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उत्तराखण्ड के वह 52 ऐतिहासिक गढ..!

उत्तराखण्ड के वह 52 ऐतिहासिक गढ जो इतिहास के सुनहरे पन्नों मे खो गये

गढवाल को कभी 52 गढ़ों का देश कहा जाता था। असल में तब गढ़वाल में 52 राजाओं का आधिपत्य था। उनके अलग अलग राज्य थे और वे स्वतंत्र थे। इन 52 गढ़ों के अलावा भी कुछ छोटे छोटे गढ़ थे जो सरदार या थोकदारों (तत्कालीन पदवी) के अधीन थे। चीनी यात्री ह्वेनसांग ने इनमें से कुछ का जिक्र किया था। ह्वेनसांग छठी शताब्दी में भारत में आया था। इन राजाओं के बीच आपस में लड़ाई में चलती रहती थी। माना जाता है कि नौवीं शताब्दी लगभग 250 वर्षों तक इन गढ़ों की स्थिति बनी रही लेकिन बाद में इनके बीच आपसी लड़ाई का पवांर वंश के राजाओं ने लाभ उठाया और 15वीं सदी तक इन गढ़ों के राजा परास्त होकर पवांर वंश के अधीन हो गये। इसके लिये पवांर वंश के राजा अजयपाल सिंह जिम्मेदार थे जिन्होंने तमाम राजाओं को परास्त करके गढ़वाल का नक्शा एक कर दिया था।

गढ़वाल में वैसे आज भी इन गढ़ों का शान से �जिक्र होता और संबंधित क्षेत्र के लोगों को उस गढ़ से जोड़ा जाता है। मैं बचपन से इन गढ़ों के आधार पर लोगों की पहचान सुनता आ रहा हूं। गढ़वाल के 52 गढ़ों का संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है …
पहला … नागपुर गढ़ : यह जौनपुर परगना में था। यहां नागदेवता का मंदिर है। यहां का अंतिम राजा भजनसिंह हुआ था।
दूसरा … कोल्ली गढ़ : यह बछवाण बिष्ट जाति के लोगों का गढ़ था।
तीसरा … रवाणगढ़ : यह बद्रीनाथ के मार्ग में पड़ता है और रवाणी जाति का होने के कारण इसका नाम रवाणगढ़ पड़ा।
चौथा … फल्याण गढ़ : यह फल्दकोट में था और फल्याण जाति के ब्राहमणों का गढ़ था। कहा जाता है कि यह गढ़ पहले किसी राजपूत जाति का था। उस जाति के शमशेर सिंह नामक व्यक्ति ने इसे ब्राह्मणों का दान कर दिया था।
पांचवां … वागर गढ़ : यह नागवंशी राणा जाति का गढ़ था। इतिहास के पन्नों पर झांकने पर पता चलता है कि एक बार घिरवाण खसिया जाति ने भी इस पर अधिकार जमाया था।
छठा … कुईली गढ़ : यह सजवाण जाति का गढ़ था जिसे जौरासी गढ़ भी कहते हैं।
सातवां … भरपूर गढ़ : यह भी सजवाण जाति का गढ़ था। यहां का अंतिम थोकदार यानि गढ़ का प्रमुख गोविंद सिंह सजवाण था।
आठवां … कुजणी गढ़ : सजवाण जाति से जुड़ा एक और गढ़ जहां का आखिरी थोकदार सुल्तान सिंह था।
नौवां … सिलगढ़ : यह भी सजवाण जाति का गढ़ था जिसका अंतिम राजा सवलसिंह था।
दसवां … मुंगरा गढ़ : रवाई स्थित यह गढ़ रावत जाति का था और यहां रौतेले रहते थे।
11वां … रैका गढ़ : यह रमोला जाति का गढ़ था।
12वां … मोल्या गढ़ : रमोली स्थित यह गढ़ भी रमोला जाति का था।
13वां … उपुगढ़ : उद्येपुर स्थित यह गढ़ चौहान जाति का था।
14वां … नालागढ़ : देहरादून जिले में था जिसे बाद में नालागढ़ी के नाम से जाना जाने लगा।
15वां … सांकरीगढ़ : रवाईं स्थित यह गढ़ राणा जाति का था।
16वां … रामी गढ़ : इसका संबंध शिमला से था और यह भी रावत जाति का गढ़ था।
17वां … बिराल्टा गढ़ : रावत जाति के इस गढ़ का अंतिम थोकदार भूपसिंह था। यह जौनपुर में था।
18वां … चांदपुर गढ़ : सूर्यवंशी राजा भानुप्रताप का यह गढ़ तैली चांदपुर में था। इस गढ़ को सबसे पहले पवांर वंश के राजा कनकपाल ने अपने अधिकार क्षेत्र में लिया था।
19वां … चौंडा गढ़ : चौंडाल जाति का यह गढ़ शीली चांदपुर में था।
20वां … तोप गढ़ : यह तोपाल जाति का था। इस वंश के तुलसिंह ने तोप बनायी थी और इसलिए इसे तोप गढ़ कहा जाने लगा था। तोपाल जाति का नाम भी इसी कारण पड़ा था।
21वां … राणी गढ़ : खासी जाति का यह गढ़ राणीगढ़ पट्टी में पड़ता था। इसकी स्थापना एक रानी ने की थी और इसलिए इसे राणी गढ़ कहा जाने लगा था।
22वां … श्रीगुरूगढ़ : सलाण स्थित यह गढ़ पडियार जाति का था। इन्हें अब परिहार कहा जाता है जो राजस्थान की प्रमुख जाति है। यहां का अंतिम राजा विनोद सिंह था।
23वां … बधाणगढ़ : बधाणी जाति का यह गढ़ पिंडर नदी के ऊपर स्थित था।
24वां … लोहबागढ़ : पहाड़ में नेगी सुनने में एक जाति लगती है लेकिन इसके कई रूप हैं। ऐसे ही लोहबाल नेगी जाति का संबंध लोहबागढ़ से था। इस गढ़ के दिलेवर सिंह और प्रमोद सिंह के बारे में कहा जाता था कि वे वीर और साहसी थे।
25वां … दशोलीगढ़ : दशोली स्थित इस गढ़ को मानवर नामक राजा ने प्रसिद्धि दिलायी थी।
26वां … कंडारागढ़ : कंडारी जाति का यह गढ़ उस समय के नागपुर परगने में थे। इस गढ़ का अंतिम राजा नरवीर सिंह था। वह पंवार राजा से पराजित हो गया था और हार के गम में मंदाकिनी नदी में डूब गया था।
27वां … धौनागढ़ : इडवालस्यू पट्टी में धौन्याल जाति का गढ़ था।
28वां … रतनगढ़ : कुंजणी में धमादा जाति का था। कुंजणी ब्रहमपुरी के ऊपर है।
29वां … एरासूगढ़ : यह गढ़ श्रीनगर के ऊपर था।
30वां … इडिया गढ़ : इडिया जाति का यह गढ़ रवाई बड़कोट में था। रूपचंद नाम के एक सरदार ने इस गढ़ को तहस नहस कर दिया था।
31वां … लंगूरगढ़ : लंगूरपट्टी स्थिति इस गढ़ में भैरों का प्रसिद्ध मंदिर है।
32वां … बाग गढ़ : नेगी जाति के बारे में पहले लिखा था। यह बागूणी नेगी जाति का गढ़ था जो गंगा सलाण में स्थित था। इस नेगी जाति को बागणी भी कहा जाता था।
33वां … गढ़कोट गढ़ : मल्ला ढांगू स्थित यह गढ़ बगड़वाल बिष्ट जाति का था। नेगी की तरह बिष्ट जाति के भी अलग अलग स्थानों के कारण भिन्न रूप हैं।
34वां … गड़तांग गढ़ : भोटिया जाति का यह गढ़ टकनौर में था लेकिन यह किस वंश का था इसकी जानकारी नहीं मिल पायी थी।
35वां … वनगढ़ गढ़ : अलकनंदा के दक्षिण में स्थित बनगढ़ में स्थित था यह गढ़।
36वां … भरदार गढ़ : यह वनगढ़ के करीब स्थित था।
37वां … चौंदकोट गढ़ : पौड़ी जिले के प्रसिद्ध गढ़ों में एक। यहां के लोगों को उनकी बुद्धिमत्ता और चतुराई के लिये जाना जाता था। चौंदकोट गढ़ के अवशेष चौबट्टाखाल के ऊपर पहाड़ी पर अब भी दिख जाएंगे।
38वां … नयाल गढ़ : कटुलस्यूं स्थित यह गढ़ नयाल जाति था जिसका अंतिम सरदार का नाम भग्गु था।
39वां … अजमीर गढ़ : यह पयाल जाति का था।
40वां … कांडा गढ़ : रावतस्यूं में था। रावत जाति का था।
41वां … सावलीगढ़ : यह सबली खाटली में था।
42वां … बदलपुर गढ़ : पौड़ी जिले के बदलपुर में था।
43वां … संगेलागढ़ : संगेला बिष्ट जाति का यह गढ़ यह नैल चामी में था।
44वां … गुजड़ूगढ़ : यह गुजड़ू परगने में था।
45वां … जौंटगढ़ : यह जौनपुर परगना में था।
46वां … देवलगढ़ : यह देवलगढ़ परगने में था। इसे देवलराजा ने बनाया था।
47वां … लोदगढ़ : यह लोदीजाति का था।
48वां … जौंलपुर गढ़
49वां … चम्पा गढ़
50वां … डोडराकांरा गढ़
51वां … भुवना गढ़
52वां … लोदन गढ़


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गुजडू गढ़ी का संक्षिप्त इतिहास

गुजडू गढ़ी का संक्षिप्त इतिहास
उत्तराखण्ड और उत्तराखण्ड से संबंधित किसी विषय पर  इतिहास का लेखा जोखा संपुर्ण नही मिलेगा जितना किताबो मे या देखने को मिलता है वह वर्ष के हिसाब से कुछ सुनी बातो से कुछ अंदाजों से लिखा गया है इसी तरह उत्तराखण्ड मे गढ़ो का इतिहास लिखित मे कुछ नही है पर यह हे काफी वर्षो पुराना ।

कत्युरीयों और पंवार वंश से पहले यहां ठकुरी राजाओं का बोल बाला था यह गढ़ उनके ही इतिहास को दर्शाते है गुजडू गढ़  जो गुजडू परगने मे था यह सभी गढ़ों से अलग है इसके आस पास मनोहारी प्राकृतिक दृश्य बांज और पहाड़ी पेडों से घिरा जंगल एक और जहां दीबा डांडा का जंगल है वही दुसरी और जो दुर दुर  तक दुसरे क्षेत्र कुमाऊ और गढ़वाल को आप यहां से अच्छे से देख सकते है।

इसके ठीक सामने सफेद हिमालय खडा निहारता नजर आता है सबसे उपर गढ़ मे माँ भगवती का मंदिर है कहा यह भी जाता है कि जब पांडवों को स्वर्गजाना था तब नुकुल इसी रास्ते आए थे और इस मंदिर का निर्माण किया था तब उसके बाद से यह मंदिर पुरे सीमान्त क्षेत्र की रक्षा कर रहा है ।

आज गुजडू गढ़ के निशान कम ही है पर सबसे बड़ी बात इसके इतिहास को जो जिंदा रखती है वह है गढ़ों  के अंदर के रास्ते और कुए जो  गुजडू गढ़ी मे नीचे की तरफ सेनिको के छिपने ,भागने या दुश्मन को चकमा देने के लिए  बने  हे वह देखने लाईक है पहले कुऐ मे अन्दर प्रवेश करते ही ऊपर की और सीढ़ीयां बनी है  इसके दोनो और कुएं मिलेगे जो एकदम अंदर जाते समय नही नजर आते अंदेरा होता है  जिसमे शुद्व पानी ओर एकदक ठण्डा पानी होगा , कुए छोटे है जिसका कारण था की दुश्मन जब बाहर से अंदर को आए और वही सीढी से ऊपर जाए तब कुए मे छीप कर दुश्मन पर वार किया जा सके अंदर दो रास्ते मिलते है कहते है यह रास्ते अंदर ही अंदर 15 किलोमिटर तक बने है यह अलग अलग दिशा मे बहुत दुर जाकर निकलते है पुराने लोगो ने इसके सबुत भी दिए अंदर ही अंदर सुरंग के इंसान यहां आराम से दुसरी तरफ निकल सकता है क्योंकि अंदर रास्ते मे पानी भी है जिसकी वजह से यहां आक्सीजन की कमी नही होती।

सुंरग और कुए की कारीगरी देखकर लगता है यह किसी उस समय की यह सोच और कलाकारी किसी दिमाग से बनाई होगी।  अब इनके से कुछ कुए को चुनाई से बंद कर दिया है ताकि कोई जा नही पाए या फस न जाए ।  ठकुरी राजाओ के आपसी लडाई के बाद यह गढ़ कुछ समय कत्युरो और रोहिलों के आधीन रहा  बाद मे यह कुछ समय तक तीलु रौतेली का सीमांत गढ़ भी रहा जहां से वह अपने सीमा की चौकसी करती थी। बाद मे यह गढ़ पवांर वश के आधीन रहा। गोरखणी राज 1803 से 1814 तक गौरखाओं ने इस गढ़ को तहस नहस कर यहां से काफी मात्रा मे लुटपाट की उसके बाद संधि के तौर पर यह क्षेत्र बिट्रिश गढ़वाल के आधीन आने के बाद से आज तक अपने ऐतिहास को दबाए हुए है दुसरी तरफ आसौ गाड़ से लेकर रसियामाहदेव तक उपजाऊ जमीन तब ठकुरी राजाओं या शासको का यही एक लगान के तौर पर अनाज अपने सैनिको और परिवार के लिए जुटाते थे गुजडू गढ़ी अपने आप मे अलग ही इतिहास रखता है  इतना ऐतिहासिक क्षेत्र जो पर्यटक के तौर पर पुरे क्षेत्र का विकास कर सकता है  रामनगर से 55 किमी आते समय भौन देवी के दर्शन हो सकते है और  फिर गुजडू गढ़ी का ऐतिहासिक गढ़ देखने के बाद दुसरे दिन आराम से दीबा देवी या दीबा गढ़ देखते हुए  बुंगी मंदिर के दर्शन करके कोटद्वार होते हुए वापस जा सकते है